१. ऐतिहासिक महत्व और कालखंड
इतिहासकारों ने सर्वसम्मति से भगवान पार्श्वनाथ की ऐतिहासिकता को स्वीकार किया है। वे जैन धर्म के २३वें तीर्थंकर हैं और ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित प्रथम जैन तीर्थंकर माने जाते हैं।
समय काल: वे भगवान महावीर से लगभग ३०० वर्ष पूर्व हुए थे।
ऐतिहासिक तिथि: उनका काल ८७७ ईसा पूर्व से ७७७ ईसा पूर्व (877-777 BC) माना जाता है।
२. प्रारंभिक जीवन और परिवार
भगवान पार्श्वनाथ का जन्म प्राचीन नगरी वाराणसी (काशी) के राजपरिवार में हुआ था।
पिता: राजा अश्वसेन
माता: रानी वामा देवी
पृष्ठभूमि: दीक्षा लेने से पूर्व वे एक राजकुमार थे।
३. वैराग्य और कठोर तपस्या
राजसी सुखों का त्याग कर, ३० वर्ष की आयु में उन्होंने संसार से विरक्ति ले ली और तपस्वी बन गए।
तपस्या: उन्होंने ८३ दिनों तक कठोर तपस्या की।
केवलज्ञान: तपस्या के ८४वें दिन उन्हें 'केवलज्ञान' (पूर्ण ज्ञान) की प्राप्ति हुई।
४. धर्म प्रचार और मोक्ष प्राप्ति
ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने अपना शेष जीवन सत्य और अहिंसा के प्रचार में व्यतीत किया।
सिद्धांत प्रचार: भगवान पार्श्वनाथ ने ७० वर्षों तक अपने सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार किया।
निर्वाण: १०० वर्ष की आयु में उन्हें सम्मेद शिखर जी (पार्श्वनाथ पर्वत) पर मोक्ष की प्राप्ति हुई।
Key Points in English (Summary)
Here are the essential highlights of the post for quick reference:
Identity: Lord Parshvanatha is the 23rd Tirthankara of Jainism.
Historical Era: He lived between 877 BC and 777 BC.
Relation to Mahavira: He lived approximately 300 years before Lord Mahavira.
Birthplace: Varanasi (Parents: King Ashvasena and Queen Vama Devi).
Renunciation: He became an ascetic at the age of 30.
Enlightenment: Attained Kevala Jnana on the 84th day after 83 days of penance.
Liberation (Moksha): Attained Nirvana at the age of 100 at Sammed Shikhar Ji