१. कर्म की परिभाषा और अस्तित्व

जो आत्मा को परतंत्र करता है, दुःख देता है और संसार में परिभ्रमण (भटकाता) कराता है, उसे 'कर्म' कहते हैं।

२. कर्म बंध का उदाहरण (लोहे का गोला)

कर्म आत्मा से कैसे चिपते हैं, इसे एक सटीक उदाहरण से समझा जा सकता है:

जिस प्रकार अग्नि से तपाया हुआ लोहे का गोला पानी में डालते ही चारों तरफ से पानी को खींच लेता है, ठीक वैसे ही संसारी आत्मा के मन, वचन और काया की क्रियाओं (योग) से प्रतिक्षण कर्म-परमाणु खिंचकर सभी आत्मप्रदेशों में आते रहते हैं।

३. कर्म के मुख्य दो रूप (द्रव्यकर्म और भावकर्म)

कर्म को मूल रूप से दो भागों में बांटा गया है:

  1. द्रव्यकर्म: पुद्गल (जड़ पदार्थ) के परमाणुओं के समूह को 'द्रव्यकर्म' कहते हैं।

  2. भावकर्म: उन द्रव्यकर्मों में जो फल देने की शक्ति होती है, अथवा कर्म के निमित्त से आत्मा में जो राग-द्वेष, अज्ञान आदि भाव उत्पन्न होते हैं, उन्हें 'भावकर्म' कहते हैं।

४. कर्म के ८ मूल भेद

जैन दर्शन में कर्मों को ८ मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है:

  1. ज्ञानावरण (Gyanavaran): जो आत्मा के ज्ञान गुण को ढक लेता है (जैसे बादल सूर्य को ढक लेते हैं)।

  2. दर्शनावरण (Darshanavaran): जो आत्मा के दर्शन (सामान्य अवलोकन) गुण को ढक देता है।

  3. वेदनीय (Vedaniya): जो आत्मा को सुख और दुःख का अनुभव कराता है (साता और असाता)।

  4. मोहनीय (Mohaniya): जिसके उदय से जीव अपने असली स्वरूप को भूलकर दूसरों (शरीर आदि) को अपना समझने लगता है। यह सबसे प्रबल कर्म है।

  5. आयु (Ayu): जो जीव को नरक, तिर्यंच, मनुष्य या देव गति के शरीर में एक निश्चित समय तक रोके रखता है (जैसे जेल)।

  6. नाम (Naam): जिससे शरीर, रूप, रंग और अंगोपांग की रचना होती है (जैसे चित्रकार)।

  7. गोत्र (Gotra): जिसके कारण जीव उच्च या नीच कुल में जन्म लेता है।

  8. अंतराय (Antaray): जो दान देने, लाभ प्राप्त करने या भोग-उपभोग में विघ्न (रुकावट) डालता है।

५. घातिया और अघातिया कर्म

इन आठ कर्मों को पुनः दो श्रेणियों में बांटा गया है:


Key Points in English

Here are the essential highlights regarding the Jain Theory of Karma: